शिक्षा में पुनर्विचार
-आर्यमान और इरिना, पगडंडी संगठन
देश में चल रहे युवा आंदोलन ने हम सब को शिक्षा और युवाओं के भविष्य पे सोचने को मजबूर कर दिया है। तत्कालीन मुद्दा NEET एग्ज़ाम में पेपर लीक का है लेकिन आंदोलन में दिख रही ऊर्जा बताती है की बात उस से ज़्यादा गहरी है। उस गहराई में जा के सवालों को उठाना ज़रूरी है।
क्या नीट का इम्तिहान ठीक से होने लगेगा तो शिक्षा व्यवस्था देश के युवाओं के प्रति न्यायपूर्ण बन जाएगी?
हर साल लाखों युवा नीट, iit, upsc, teacher इत्यादि के इम्तिहान लिखते हैं। बनारस, लखनऊ, दिल्ली जैसे शहरों में रेंट देते हुए अपनी जिंदगी के, अपनी युवा अवस्था के कीमती साल निकाल देते हैं। और ये सब किस चीज के लिए?
इस शिक्षा तंत्र में चंद सौ-हज़ार लोगों से ज़्यादा की जगह नहीं है। बाकी लाखों लोग हर साल फेल्योर बन के रह जाते हैं। कुल मिला के ये व्यवस्था फेल्योर बनाने का तंत्र है। ये व्यवस्था एक समाज को निराश बनाने की व्यवस्था है। ये व्यवस्था समाज को 1% और 99% में बाटने वाली व्यवस्था है।
हम क्यों इस रेस में दौड़ रहे हैं? क्या कॉलेज और यूनिवर्सिटी हमें न्यायपूर्ण शिक्षा दे सकते हैं? हमें इस तंत्र की बुनियाद को जरा परखना पड़ेगा। आज गोवा में किसानों का एक बड़ा संघर्ष चल रहा है। एक नया IIT बनाने के लिए सरकार किसानों की ज़मीन छीन रही है। लेकिन किसान अपनी ज़मीन नहीं छोड़ना चाहते हैं। गोवा के किसानों का संघर्ष हमें सोचने को मजबूर करता है – आख़िर तमाम IIT और University के कैंपस किस की ज़मीन पे बने हैं? हर आधुनिक कॉलेज और यूनिवर्सिटी किसी ना किसी गाँव से जमीन छीन के बनाए गए हैं। यूनिवर्सिटी उस तंत्र का नाम है जो किसी गाँव से जमीन छीन के दीवार खड़ी कर के, सिक्योरिटी गार्ड द्वारा स्थानिया लोगों को बाहर रख के चंद छात्रों को जमीन से बिछड़े ज्ञान का उपभोगता बनाता है।
जिस तंत्र की बुनियाद में ही अन्याय है, वो क्या हमें न्याय पूर्ण शिक्षा व्यवस्था दे सकती है? क्या शिक्षा पाने का यही तरीका है? क्या हमारे पास और कोई तरीके नहीं हैं?
इस शिक्षा तंत्र के बदौलत हम क्या हासिल कर पाए हैं? आज सब से ज़्यादा संख्या में बेरोजगार वो लोग हैं जो यूनिवर्सिटी से डिगरी ले कर बैठे हैं। जो यूनिवर्सिटी नहीं जा पा रहा है वो भी निराश है, जो कुछ लाखों रुपये खर्च कर जा चुका है वो भी निराश ही है।
और इस तंत्र के श्रेष्ठ छात्र कौन हैं? आज भारत से निकले लोग अमरीका की बड़ी कंपनियों में CEO जैसे नेतृत्व के बड़े पदों पे बैठे हैं। हमें बताया गया है कि ये भारत के लिए एक गर्व का विषय है। लेकिन आख़िर इन का योगदान क्या है? चीन का बाज़ार अमरीकी कंपनियों के लिए बंद है, और भारत का बाज़ार उन के लिए खुला है। भारत उन के लिए सब से बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार में अपना कारोबार जमाने के लिए इन कंपनियों ने अपने मुख्य शेरपा की तरह भारत के इन श्रेष्ठ छात्रों को रखा हुआ है। यानी कि ये तथाकथित श्रेष्ठ छात्र असल में श्रेष्ठ ग़ुलाम हैं, और बाक़ी देश को विदेशी कंपनियों का गुलाम बनाने के काम में अपना सहयोग दे रहे हैं। अनेक माँ-बाप को कंप्यूटर की स्क्रीन पे और बच्चों को स्मार्टफोन की स्क्रीन पे आश्रित बनाना इस की सिर्फ़ एक मिसाल है।
गुलामी की बात से याद आता है, हमें शायद एक और सवाल पूछना चाहिए। इस शिक्षा व्यवस्था का इतिहास आखिर क्या है? इस की शुरुआत कहाँ से हुई? ये कहाँ से आया?
स्कूल और कॉलेज एक खास ज्ञान परंपरा की शिक्षा व्यवस्था है। इस का आगमन यूरोप से अंग्रेज़ सत्ता की देख रेख में हुआ और ये वहाँ के शास्त्री प्रशिक्षण परंपरा से जुड़ा हुआ है। ये वहां से कुछ खास देखने और सोचने के तरीके ले के आया है। भारत में उस का एक खास प्रयोग भी था। अंग्रेज शासन के सामने 19वीं शताब्दी में एक बड़ी चुनौती थी कि वे बाहर से आए हुए कुछ हज़ार लोग थे और उन्हें करोड़ों स्थानीय लोगों पे अपना शासन जमाना था। जंग जीतना एक बात होती है और राज क़ायम रखना एक और बात। इस दूसरे मकसद को पूरा करने के लिए जरूरी था भारतीयों में गुलाम मानस का निर्माण करना, और इस का सब से असरदार जरिया था एक नई शिक्षा नीति। इंसान को बचपन से ही गुलाम बना दिया जाए, तो उस से बढ़िया शासक के लिए क्या हो सकता है?
इस शिक्षा को पहले राजाओं के बेटों पे, बड़े पंडितों के बेटों पे और बड़े व्यापारियों के बेटों पे लागू किया गया और बाद में ‘न्यायपूर्ण’ बनाने के बहाने से बेटियों पे और अन्य वर्ग और जातियों के लिए भी। आज भी अन्य जाति के लोग इस गुलामी की शिक्षा में अपना स्थान बनाने की उम्मीद में संघर्ष कर रहे हैं। और शिक्षा के क्षेत्र में सब से बड़े सवालों में यह है कि इस शिक्षा में किस की कितनी जगह होनी चाहिए।
इस गुलाम मानस पैदा करने वाली शिक्षा का प्रभाव यह रहा कि आजादी के बाद भी भारत के नेता इस ही बात से जूझते रहे कि इस शिक्षा व्यवस्था को अधिक से अधिक बच्चों तक कैसे पहुंचाया जाए। सरकार के विरोधी भी इस ही बात की आलोचना करते हैं कि इस शिक्षा व्यवस्था को ज़्यादा करोड़ रुपये का बजट क्यों नहीं दिया जा रहा।
इस शिक्षा व्यवस्था ने आज तक कुल मिला के क्या हासिल किया है? उस ने यह हासिल किया है कि किसान और कलाकार के बच्चों से ले के अफ़सर और टीचरों के बच्चों को – मात्र 10-12 साल में – आज्ञाकारी उपभोगता के रूप में तैयार किया है। आधुनिक शिक्षा छात्रों को मात्र काग़ज़ी ज्ञान के उपभोगता बना रही है और अध्यापकों को सर्विस प्रोवाइडर। ऐसा उपभोगता जो अपनी ज़िंदगी के लगभग हर पहलू के लिए बाज़ार या सरकार पर निर्भर होता है। जो ना अपने लिए खाना उगाना जानता है ना बनाना। जिसे यह नहीं पता की उसके कपड़े, रोज़ मर्रा की वस्तुएँ, या फिर उसका घर कैसे बनते हैं। जो अपनी और दूसरों की सेहत के बारे में बिकुल अनजान है। जिसे अपने आस पास के पेड़, पौधे, पंछी, जानवर, नहर, नदी, जंगल, गांवों और समाज से कोई परिचय नहीं है। यदि गलती से कोई इन बातों का कोई ज्ञान रखता है तो वो उस शिक्षा व्यवस्था के बावजूद रखता है, ना कि उस के बदौलत।
इस के विपरीत, सही शिक्षा हमें दुनिया में सहजता से जीना सिखाती है, वो हमें अपने स्थानीय संसाधनों के समझदार उपयोग से समृद्ध जीवन की और ले जाती है। ऐसी शिक्षा असुरक्षा की भावना को दूर रखती है। इस में अक़्ल के साथ साथ शरीर और मानस का विकास भी उतना ही महत्व का है। हम अपने संसाधन कैसे जुटाएँ, संपदा कैसे संजोए, एक दूसरे का ख़याल कैसे रखें, ये सब उस के महत्वपूर्ण आयाम हैं।
यहां पर एक मूल सवाल पूछने की जरूरत है। ज्ञान क्या होता है और वो कहाँ पाया जाता है? क्या ज्ञान ऐसी पानी की बूंदों का नाम है जो उन बादलों से गिरती हैं जो सिर्फ यूनिवर्सिटी कैंपस के ऊपर पाये जाते हैं और जो सीधे जा के प्रोफेसरों के सिर पे टपकती हैं? क्या प्रोफेसर लोग अपनी दिमाग की टोकरी छत पे खड़े हो कर इन बूंदों को बटोरते बैठते है? और तभी जा के क्लासरूम में बाँटते हैं?
ज्ञान तो वो है जो हर बुनकर के पास है और हर कुम्हार के पास है, हर कारीगर और हर किसान के पास है। यानी ज्ञान हर जगह पाया जा सकता है। ज्ञान शहरों के गली और मोहल्लों में पाया जा सकता है, वो घाट पे, पर्वत पे पाया जा सकता है, वो जंगल में और रेगिस्तान में पाया जा सकता है, वो गांव देहात के हर कोस पे पाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान ज्ञान की सिर्फ एक श्रेणी है और उसे भी यूनिवर्सिटी की चार दीवारी में कैद रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब हम इस बात को मानने लगेंगे, तब हम पाएंगे कि ज्ञान कोई दुर्लभ चीज़ नहीं है, और यूनिवर्सिटी के पास उस का कोई ठेका नहीं है।जब हम ज्ञान की सही पहचान करेंगे तो हम ज्ञान का अभाव महसूस करना छोड़ देंगे। उस के लिए परेशान होना बंद कर देंगे। उस के लिए भीख मांगना बंद कर देंगे। उस के लिए रेस दौड़ने के लिए परेशान होना बंद कर देंगे।
आज शिक्षा को नियंत्रित करने के क्या क्या तरीके हो सकते हैं, हमें इस पे पुनर्विचार करना होगा। हमें लगता है कि हर सुलभ स्थान पे ज्ञान के मंदिर प्रफुल्लित होने की संभावना है, और ये कोई मुश्किल बात नहीं है। हर समाज में सयाने, समझदार लोग मौजूद हैं, जो अपने समाज के ज्ञान को संजो के रखने का काम कर सकते हैं, और यदि उन को मौक़ा मिले, तो वे उस काम को ज़िम्मेदारी से करना चाहेंगे। जिस तरह गणेश पंडाल और दुर्गा पंडाल लगाने का चंदा समाज में से निकल आता है, वैसे ही इस लोकविद्या शिक्षा व्यवस्था के लिए भी निकाला जा सकता है। बल्कि गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा जैसे अवसर भी सीखने-समझने के मौके बनाए जा सकते हैं जिस में कारीगरों के काम को देखने से ले के उस की अर्थव्यवस्था परखने पर और पंडालों पे बात-चित तक की शिक्षा की प्रक्रियाएं संभव हैं। इस प्रकार पूरे पूरे शहर और पूरे पूरे गाँव हमारे यूनिवर्सिटी समान हो सकते हैं। हर शहर में आज कई घर मिल जाएँगे जो कि साल भर नहीं तो कई महीने खाली ही पड़े रहते हैं। ऐसे स्थानों को चिह्नित करते हुए रहने-सहने की व्यवस्थाएँ भी कम खर्च से चलाई जा सकती है। हमारे देश में ब्राह्मणों को खाना खिलाना वैसे भी पुण्य का काम माना गया है। इस को लोक शिक्षा परंपरा क़ायम रखने के एक लोक परंपरा की दिशा में ले जाया जा सकता है। शहर और गाँव के अलग अलग घरों को ये मौक़ा दिया जा सकता है कि वे सीखने और सिखाने वालों को बारी-बारी भोजन-पोषण प्रदान करें।
इस प्रकार सरकारों और कंपनियों के अतिरिक्त जा के शिक्षा की एक शानदार व्यवस्था बहुत आराम से बनाई जा सकती है। ऐसी शिक्षा के लिए कोई बहुत बड़ा बजट नहीं चाहिए और कोई बड़ी संस्था नहीं चाहिए। पगडंडी संगठन इस दिशा में कार्यरत है। पिछले कुछ सालों से हम युवाओं के बीच इस तरह के सीखने-समझने के कार्यरमा करते आए हैं जिन में हम ने किसानों के साथ, कारीगरों के साथ सीखा है, उन की उपस्थिति में अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण जैसे विषयों पे शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों के साथ चर्चाएं चलाई हैं। ये सब बिना फीस मांगे, समाज से ही चंदा माँग के किया है। यदि आप इन विचारों से और इस काम की दिशा से सहमत हैं, तो आइए हम बैठ के बात करें। आज ज़रूरत है कि हम शिक्षा का आयोजन अपने हाथों में ले। किसी सरकार या उद्योगपति का इंतज़ार करना व्यर्थ है।
-आर्यमान और इरिना, पगडंडी संगठन
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