वंदे मातरम: आनंदमठ से हिंदू राष्ट्र तक
संसद का एक पूरा सत्र बीत गया. शिक्षा, रोज़गार, महंगाई पर बात लगभग नहीं हुई. आख़िरी दिन एक क़ानून आया — वंदे मातरम का संपूर्ण पाठ न गाना अब ‘राष्ट्रीय अपमान’ के दायरे में है. कड़वी कॉफ़ी की इस कड़ी में कलाकार, लेखक और रक़्स मीडिया कलेक्टिव से जुड़े शुद्धब्रत सेनगुप्त इस पूरे प्रकरण को उसकी जड़ तक ले जाते हैं. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 के आसपास जो दो छंद लिखे थे, वे राग मलार में गाए जाने के निर्देश के साथ छपे थे — करुण रस, वीर रस नहीं. छह छंद बाद में आनंदमठ में जुड़े, और वहीं दुर्गा की एक विशिष्ट प्रतिमा की स्तुति आती है. ‘सप्तकोटि’ भारत नहीं, बंकिम के समय की बंगाल की आबादी है. पूरे आनंदमठ में ‘भारत’ शब्द एक बार भी नहीं आता.
बातचीत में: सन्यासी-फ़क़ीर विद्रोह से ‘फ़क़ीर’ का लोप कैसे हुआ, आनंदमठ का वह अंतिम अध्याय जो अंग्रेज़ी राज को स्वीकार करने की सलाह देता है, बसंत कुमार रॉय के अनुवाद से मुसलमानों का ग़ायब कर दिया जाना, जूलियस लिपनर का अनुवाद, घरे-बाइरे और गोरा में रवींद्रनाथ का जवाब, चंद्रनाथ बसु से सावरकर तक ‘हिंदुत्व’ शब्द की यात्रा, 1937 का कांग्रेस कार्यसमिति प्रस्ताव जिसे सरदार पटेल ने अनुमोदित किया था, बीजू इमैनुएल बनाम केरल राज्य का वह फ़ैसला जो कहता है कि ख़ामोश रहना अपमान नहीं, और जन गण मन के वे छंद जो हम ख़ुद कभी नहीं गाते.
और अंत में गांधी — कनपटी पर बंदूक़ रखकर गीता गवाई जाए, तो वे गीता भी नहीं गाएँगे. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
https://www.youtube.com/watch?v=oaVInvk0RJg
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