हृदयेश जोशी, 24 अक्टूबर 2026
प्रिय आशीष नंदी जी, कुमार प्रशांत जी, चयन समिति के माननीय सदस्य और सम्मानित उपस्थित जन,
लेखक और पत्रकार कुलदीप नैयर जी की स्मृति में दिये जाने वाले इस सम्मान के लिए मैं गांधी शांति प्रतिष्ठान और चयनकर्ताओं का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। इसे पाकर मैं जितना प्रसन्न हूं, उससे कहीं अधिक अनुगृहीत महसूस कर रहा हूँ। मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि देश में कई पत्रकार मुझसे कहीं अधिक काबिल और साहसी हैं और शायद वे इस सम्मान के मुझसे अधिक हकदार हैं।
अपने करीब तीन दशक के सफर में जिन लोगों के सान्निध्य से मैंने सीखा, जिन्होंने मुझे समृद्ध किया और मेरी दृष्टि को विस्तार दिया, उनके प्रति आभार व्यक्त करने का भी यह अवसर है।
आज मैं अपनी पत्रकारिता के बारे में स्वयं कुछ कहूँ, यह उचित नहीं होगा। मैं केवल उस सफर की बात कर सकता हूँ, जिसने मुझे जो कुछ भी अच्छा काम मैं कर पाया, उसके लिए प्रेरणा दी।
रिपोर्टिंग के दौरान भारत के अलग-अलग हिस्सों में घूमते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रकारों का काम उन कहानियों को लिखना और कैमरे में दर्ज करना है, जो अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। लेकिन कई बार इन कहानियों के सामने आने के बावजूद सरकारें उन लोगों के लिए कुछ नहीं करतीं, जिनकी मदद करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। उलटे, सबसे कमजोर और वंचित लोगों के हिस्से के संसाधन धीरे-धीरे अधिक सबल और संपन्न लोगों के पास जाते रहे हैं।
यह सवाल केवल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि उस समाज का भी है जिसे हम बना रहे हैं।
पत्रकारिता के आदर्शों और उसके मानदंडों पर बात करने से पहले मैं देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का जिक्र करना चाहूंगा, जिसने मेरे लेखन और पत्रकारिता को आकार दिया है।
हमारे विकास का मॉडल कुछ ऐसा है कि दूर-दराज के इलाकों में लोगों को बुनियादी सड़कें तक मयस्सर नहीं होतीं, लेकिन बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े-बड़े राजमार्ग और रेल लाइनें बिछाने के लिए जंगल और पहाड़ काटे जाते हैं वेटलैंड्स सुखाए जाते हैं और नदियों की धारायें मोड़ी जाती हैं।
विकास परियोजनाओं के नाम पर लोग बार-बार विस्थापित होते हैं। इस बारे में गांधीवादी चिंतक और पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने अपने तरीके से हमें बताया और चेताया और प्रेरणा दी। मेरे लिए ये उन्हें याद करने का भी दिन है।
पत्रकार कुलदीप नैयर जी को अक्सर 1970 के दशक में इमरजेंसी के विरोध और शानदार पत्रकारिता के लिए याद किया जाता है। लेकिन आज के दौर में जिस एक बड़ी इमरजेंसी का हम सामना कर रहे हैं वो हेल्थ इमरजेंसी है और जिसकी सबसे गंभीर चोट समाज के सबसे गरीब औऱ कमज़ोर लोगों पर है। इसका हमारे पर्यावरण से क्या रिश्ता है इस पर मैं कुछ कहना चाहूंगा।
पहले ये बताना ज़रूरी है कि हमारे सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी तो बनी ही रहती है, लेकिन उससे भी गंभीर बात ये कि योजनाकारों ने पिछले कुछ दशकों में बीमा आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था के विस्तार में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लोगों को उन इलाकों में भी स्वास्थ्य बीमा कार्ड थमाये जा रहे हैं, जहाँ डॉक्टर, नर्सें और दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
पानी और हवा के मामले में हम गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं हमारे देश एयर और वॉटर क्लॉलिटी इंडेक्स दोनों में ही दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में है। हमारी राजधानी विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है। दूर-दराज के इलाकों में लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जबकि शहरों में हमें वॉटर फिल्टर और एयर प्यूरीफायर के भरोसे छोड़ दिया गया है।
प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय कई बार कंपनियों को अदालतों में बचाने की कोशिश होती है। फिर साफ हवा के नाम पर स्मॉग टावर जैसे दिखावटी उपाय सामने आते हैं या क्लाउड सीडिंग जैसी तकनीकों का प्रचार सुर्खियां बटोरने के लिए किया जाता है।
हमारी मिट्टी में खतरनाक रसायनों का जमाव हो रहा है। कीटनाशकों के इस्तेमाल और उनके रेग्युलेशन से जुड़े सवाल हमारी खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती हैं।
आप में बहुत से लोगों को यह जानकर हैरानी होगी की आज़ादी मिलने के करीब 80 साल बाद भी भारत में कीटनाशकों के प्रबंधन कोई मुकम्मल कानून नहीं है और हम 1960 के दशक में बने एक बेहद कमज़ोर और लचर कानून के भरोसे चल रहे हैं जिसमें प्रभावी निगरानी और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल हैं।
इन समस्याओं का बोझ हर किसी पर बराबर नहीं पड़ता। बीमारी का इलाज कराना गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों को भारी आर्थिक संकट में धकेल सकता है। आर्सेनिक, फ्लोराइड, लेड, मरकरी और आयरन से दूषित पानी कई इलाकों में लोगों की सेहत और अगली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है। वायु प्रदूषण का असर केवल हमारे फेफड़ों पर नहीं पड़ता, बल्कि गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य और बच्चों के शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास पर भी पड़ सकता है।
इन सवालों को उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि पर्यावरण का संकट केवल जंगल, नदियों और पहाड़ों का संकट नहीं है। यह हमारे स्वास्थ्य, हमारी आजीविका और सामाजिक न्याय का सवाल भी है।
इसके बावजूद हमारे बड़े मीडिया संस्थानों का एक हिस्सा अपना ज्यादातर समय नफरत और सांप्रदायिक उन्माद बढ़ाने वाली हेडलाइंस और बहसों में बिताता है। स्क्रीन पर वैज्ञानिक तथ्यों और तर्क की जगह कई बार अंधविश्वास, चमत्कार और रूढ़िया ले लेती हैं। वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने के बजाय मीडिया का एक हिस्सा उसे कमजोर करने में योगदान देता है और ज्योतिषियों और धर्मगुरुओं को महिमामंडित करता है।
ऐसे में पत्रकारों, संपादकों और लेखकों की जिम्मेदारी क्या है?
इसी सवाल को ध्यान में रखते हुए मैंने पिछले कई वर्षों में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक चेतना से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग और लेखन को केंद्र में रखा है। टीवी चैनलों में कोई दो दशक बिताने के बात कुछ समाचार वेबसाइटों और अखबारों में लिखने के साथ-साथ अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी इन सवालों को सामने रखने की कोशिश करता हूं।
कुछ दोस्तों ने कहा.. बल्कि मेरे हितैषी की तरह मुझे समझाया कि मैं ऐसे विषयों पर समय लगा रहा हूं, जिनसे डिजिटल मीडिया में शायद ज्यादा व्यूज या वॉच टाइम न मिले। लेकिन मुझे लगता है कि आज इन विषयों की गंभीरता को जानते हुए भी इन पर काम न करना मेरे लिए अपने पेशे और समाज के प्रति जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा। आखिर हमारी सेहत और हमारा भविष्य इन्हीं सवालों से जुड़ा है और जानते बूझते इन पर बात न करना मेरे लिए किसी आपराधिक अनदेखी करने जैसा है।
दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई चल रही है। जब सरकारें नेचुरल रिसोर्सेस को मनमाने तरीके से निजी कंपनियों के हवाले करती हैं और राजनीतिक चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव रहता है, तो भ्रष्टाचार और असमानता को बढ़ावा मिलता है। इसका खमियाजा तो सबसे गरीब और कमजोर तबकों को भुगतना पड़ता है, जबकि संपन्न और ताकतवर लोग और अधिक धनी होते जाते हैं। मैंने इस सवाल को कई मंचों पर उठाया है। अनेक दूसरे पत्रकारों ने भी जमीनी रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता के जरिए इन सच्चाइयों को उजागर किया है।
आज मैं उन साथी पत्रकारों का विशेष आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में नहीं, बल्कि बस्तर, बुंदेलखंड और पूर्वोत्तर के कस्बों या हिमालयी राज्यों के गांवों में रहकर बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्टें भेजते हैं।
कई बार उनकी ख़बर उनके नाम के बिना प्रकाशित होती हैं।
उन्हें न पुरस्कार मिलता है, न उनके पास नियमित आमदनी होती है, न सामाजिक सुरक्षा। मीडिया का पहचान-पत्र, नियुक्ति-पत्र, बीमा या भविष्य निधि जैसी बुनियादी सुविधायें भी इन लोगों को हासिल नहीं हैं। और अगर वे किसी कानूनी मुकदमे में फंस जाये, तो उनके पास मदद के लिए कोई वकील तक नहीं होता।
यह सम्मान उन महिला पत्रकारों को भी समर्पित है, जो तमामे हमलों, मुकदमों और बेहद अश्लील ऑनलाइन ट्रोलिंग के बावजूद निर्भीकता से अपना काम कर रही हैं। इनमें से अनेक महिलायें पर्यावरण, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों पर बेबाकी से लिखती हैं। जब हम पत्रकारिता की गिरती साख को लेकर चिंतित होते हैं, तब ये महिला पत्रकार हमें याद दिलाती हैं कि साहस और प्रतिबद्धता अभी बाकी हैं।
मैंने उन जुझारू नागरिकों से भी बहुत कुछ सीखा है, जो व्यवस्था की क्रूरता के खिलाफ खड़े हुए, संवैधानिक मूल्यों का साथ दिया और भ्रष्टाचार तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। मुझे आज रुद्रप्रयाग के एक छोटे से गांव की वह महिला याद आती है, जिसने एक जलविद्युत परियोजना का विरोध करते हुए गिरफ्तार होने के बाद जमानत लेने से इनकार कर दिया था। मैं बस्तर की उन आदिवासी महिलाओं को भी नहीं भूल सकता, जो अपने नवजात शिशुओं को गोद में लेकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करती रहीं और कई किलोमीटर पैदल चलीं… इसके बावजूद उन्होंने संविधान में अपना भरोसा कायम रखा। पिछले तीन दशकों में मैंने इन संघर्षों की कहानियों को अपने काम में दर्ज करने की कोशिश की है।
पत्रकार का काम तथ्यों को सामने लाना, सत्ता से सवाल करना और उन आवाजों को जगह देना है, जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। कभी-कभी हमारे इस काम से किसी को न्याय भी मिल पाता है। लेकिन आज सरकारों का दुस्साहस इतना क्यों बढ़ गया है और वो इन महत्वपूर्ण सवालों की अनदेखी क्यों कर रही हैं? इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि मीडिया के एक हिस्से ने अपने पेशे की स्वतंत्रता और गरिमा पर गर्व करना छोड़ दिया है और सत्ता से सवाल पूछने के अपने दायित्व से समझौता कर लिया है।
फिर भी, स्वतंत्र पत्रकारों और पारंपरिक मीडिया के अनेक साथियों ने अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग से उम्मीद और भरोसा कायम रखा है। यही उम्मीद हमें काम करते रहने की ताकत देती है।
मुझे आज की युवा पीढ़ी, खासकर जेन ज़ी, से भी उम्मीद दिखाई देती है। यह पीढ़ी कई बार हमसे असहमत होती है, सवाल पूछती है और पुरानी मान्यताओं को चुनौती देती है। पर्यावरण, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर उसकी आवाज हमें बताती है कि समाज को बेहतर बनाने की आकांक्षा खत्म नहीं हुई है। बेशक, हर युवा एक जैसा नहीं है और इस पीढ़ी के सामने भी गलत सूचनाओं तथा ध्रुवीकरण की चुनौतियां हैं। लेकिन यदि इस जिज्ञासा और ऊर्जा को वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक मूल्यों और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ा जा सके, तो एक अधिक न्यायपूर्ण समाज की उम्मीद बन सकती है।
और शायद यही पत्रकारिता की भी सबसे बड़ी भूमिका है—लोगों को केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उन्हें सवाल पूछने, सोचने और अपने समय की सच्चाइयों को समझने के लिए प्रेरित करना। हालांकि अभी के ध्रुवीकृत माहौल में शायद आसान न लगे, लेकिन यह इतना कठिन भी नहीं है कि हम ये याद रखें कि सच किसी भी विचारधारा से ऊपर होता है और हमारा काम बिना किसी सनसनी के केवल और केवल सच की, तथ्यों की रिपोर्टिंग करना है ।
कुलदीप नैय्यर जी की स्मृति में दिया जाने वाला यह सम्मान मेरे लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। यह मुझे याद दिलाता है कि पत्रकारिता का असली मूल्य सत्ता के करीब होने में नहीं, बल्कि समाज के उन लोगों के साथ खड़े होने में है, जिनकी आवाज सुनी नहीं जाती।
मैं इस सम्मान को उन तमाम पत्रकारों, नागरिकों और संघर्षरत लोगों के नाम करना चाहता हूं, जिनसे मैंने साहस, धैर्य और उम्मीद का अर्थ सीखा है। अपने काम से मैं कोई बदलाव ला पाया या नहीं, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अन्याय को देखकर चुप रहना कोई विकल्प नहीं हो सकता।
हमारा काम केवल अपने समय का दस्तावेज तैयार करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज की संभावना को जीवित रखना भी है।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
हृदयेश जोशी
24 अक्टूबर 2026
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